‘दिल्ली HC के न्यायाधीश का तबादला कर भाजपा के दंगाई नेताओं का मनोबल बढ़ाया गया- रिहाई मंच’

लखनऊ, 27 फरवरी 2020। रिहाई मंच ने दिल्ली स्थित खुरेजी से सामाजिक कार्यकर्ता खालिद सैफी और पूर्व पार्षद इशरत जहां समेत अन्य लोगों को गिरफ्तार कर पुलिस द्वारा बेरहमी से पिटाई को संघी कार्रवाई करार दिया। रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि दिल्ली में सुनियोजित ढंग से भाजपा हिंसा करवा रही है जिससे कानून व्यवस्था के नाम पर सीएए के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों का दमन किया जा सके।

उन्होंने कहा कि जाफराबाद में प्रदर्शनकारियों को कानून व्यवस्था के नाम पर जबरन हटाने के बाद पुलिस खुरेजी में हमलावर हुई। पुलिस ने अपने काले कारनामें छुपाने के लिए पहले सीसीटीवी कैमरे तोड़े उसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता खालिद सैफी और पूर्व पार्षद इशरत जहां समेत अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के समय का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें देखा जा सकता है कि वहां कोई नारेबाज़ी या भड़काऊ बात नहीं हो रही थी जैसा कि पुलिस ने एफआईआर में दावा किया है। इसके विपरीत दिल्ली पुलिस का जवान जनता में भय उत्पन्न करने के लिए हाथ में नंगी रिवाल्वर लेकर लोगों को धमका रहा था। दिल्ली हिंसा में दंगाइयों की मददगार दिखने वाली पुलिस अब निर्दोषों को झूठे मुकदमे में फंसाने का कुचक्र रच रही है।

रिहाई मंच नेता राजीव यादव ने कहा कि भाजपा सरकार न्याय व्यवस्था को ध्वस्त करने पर आमादा है। दिल्ली हाईकोर्ट के जज मुरलीधर ने दिल्ली की घटनाओं पर सुनवाई करते हुए घृणास्पद बयान देने वाले भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए तो उनका ही तबादला कर दिया गया। अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अभय वर्मा पर मुकदमा दर्ज कर तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। यहां उसके विपरीत जाकर सत्ता संस्थानों का दुरुपयोग कर न्यायाधीश का तबादला कर यह संदेश दिया गया कि भाजपा के दंगाइयों के खिलाफ बोला तो ये सजा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण मामले पर सुनवाई के 24 घंटे के अंदर तबादले का आदेश दंगाइयों का मनोबल बढ़ाने जैसा है। इससे पहले दूर संचार विभाग के अधिकारी अभय शर्मा को भी भाजपा नेताओं के घृणास्पद बयान के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए चिट्ठी लिखने पर निलंबित कर दिया था।

मंच महासचिव ने कहा कि जिस तरह से दिल्ली पुलिस हिंसक घटनाओं की आंड़ में विरोध प्रदर्शनों को निशाना बना रही है उससे आशंका उत्पन्न होती है कि उत्तर प्रदेश में भी वही फार्मूला अपनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली हिंसा में हथियारों की अपूर्ति के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश को टारगेट करना इस आशंका को और प्रबल बनाता है।

रिहाई मंच ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस की मौजूदगी में सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकासान पहुंचाया गया और खुद पुलिस वालों द्वारा सीसीटीवी कैमरे तोड़ते हुए वीडियो वायरल होने के बावजूद दिल्ली सरकार ने पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली पुलिस की हिंसा में नकारात्मक भूमिका की रिपोर्टों से देश-विदेश के समाचार माध्यम पटे पड़े हैं इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने इन घटनाओं की सच्चाई जानने के लिए अलग से निष्पक्ष जांच के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया। क्या दिल्ली की जनता के उत्पीड़न से उन्हें कोई सरोकार नहीं है।

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