कोविड-19 को काबू में करने के लिए आखिर कैसे भीलवाड़ा बना आदर्श मॉडल

कोरोना को काबू करने के लिए इन दिनों भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा जोरों पर है। राजस्थान के भीलवाड़ जिले की कुल आबादी लगभग पच्चीस लाख है और जिला इसके जिला मुख्यालय की आबादी करीब चार लाख के आसपास।

इस जिले की इतनी कम आबादी के बावजूद यहां कोरोना संक्रमण तीसरे चरण में प्रवेश कर गया था और पीड़ितों की संख्या सत्ताईस तक पहुंच गई थी, दो लोगों की मौत भी हो गई। ऐसे में जिला प्रशासन ने अधिक से अधिक लोगों की जांच करने, संक्रमित रोगियों को अलग-थलग करने और सुरक्षित दूरी जैसे कदमों पर अमल के लिए बंदी को सख्ती से लागू करवाया। एक मुख्य नियंत्रण कक्ष बना कर बड़ी संख्या में टीमें बनाई गईं।

सबसे पहले जिले के हर व्यक्ति को बंदी की स्थिति में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित की गई, फिर सर्दी-जुकाम से पीड़ित लोगों तक की कोरोना के संदिग्ध मरीज होने के शक में गहन जांच की गई। इसी के साथ इस जिले को सील भी कर दिया। इस प्रकार बहुत कम समय में ही अपने जिले के लगभग सभी पच्चीस लाख लोगों की कोरोना जांच करके उसमें से संक्रमित रोगियों को छांट कर, उन्हें अलग कर उनका समुचित इलाज किया गया। इस पूरी कवायद के सुखद परिणाम आए। चार अप्रैल, 2020 के बाद आज तक भीलवाड़ा में एक भी कोरोना संक्रमित व्यक्ति नहीं मिला है।

भीलवाड़ा का यह प्रयास भारत जैसे राष्ट्र-राज्य के लिए एक बड़ी मिसाल है। भीलवाड़ा जैसा राजस्थान का एक गुमनाम-सा जिला अज सबके लिए एक नजीर बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत ने भीलवाड़ा मॉडल को अपनाते हुए काम नहीं किया तो यहां कोरोना इटली जैसी तबाही मचा सकता है।

सबसे अफसोसजनक बात यह है कि हमारे राजनीतिक कर्णधार कोरोना महामारी के संकट में भी हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद जैसी बातों से उबर नहीं पा रहे हैं। जबकि जरूरत है देश में कोरोना से निपटने के लिए तेजी और सख्ती से कदम उठाने की। (यह लेखक निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद के अपने निजी विचार है। इसमें एनवीपी न्यूज़ का कोई सरोकार नहीं है)

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