एक सच्ची महिला, खुद के सुख के लिए, पति के अलावा गैर पुरुष के लिए सोचना भी पाप है?

एक सच्ची पत्नी के लिए जिस जगह पर उसके पति को सम्मान ना मिले उस जगह पर उसको भी रहने की कोई अधिकार नहीं है। चाहे फिर वह उसके पिता का ही घर क्यों न हो। शादी से पहले पिता का मान होती है बेटियां, विवाह के बाद पति के प्रेम और सम्मान बन जाना ही हमारे कर्त्तव्य है। बताया जाता है कि, एक नारी के लिए पिता के घर से डोली उठनी चाहिए और पति के घर से अर्थी उठनी चाहिए, इन दोनों कुल को निभा लेना ही हमारे मनुष्य जीवन सफल होगा, वर्ना नर्क का द्वार तो सदा के लिए खुला है।

एक स्त्री के जीवन पिता से शुरू होकर पति पर समाप्त हो जाना ही जीवन है, इन दोनों किनारों के बीच के सफर एक स्त्री के लिए बहुत कठिन है इनमें खुशी है तो बहुत दुख भी है, लेकिन सुख के लिए हमें ग़लत मार्ग पर जाना ही सबसे बड़ी पाप है जिसका प्रायश्चित करना बहुत मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। पर हमें नारी धर्म को निभाना चाहिए चाहे जीवन कैसी भी हो। अपने सुख के लिए अपने पति के अलावा गैर पुरुष के लिए सोचना भी पाप है, और सुख के लिए पिता का पगड़ी झुकाना भी पाप है, इसलिए जीवन जैसा भी हो संतुष्ट रहना ही हमारा परम धाम है।

अब माता सीता से ज्यादा तकलीफ़ तो हमारे जीवन में नहीं आते ना?? उन्होंने अपना पिता और पति का मान कैसे रखा??

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