मार्कंडेय काटजू ने कहा, कोरोना संक्रमण के बहाने मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा, जितने भी देश के हिन्दू हैं ये एक..

एक तरह देश कोरोना संक्रमण से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इस महामारी को भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश में लगे हुए हैं। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मार्कंडेय काटजू ने एक लेख लिखा है। उन्होंने ने कहा है कि, कोरोना संकट के इस बेहद कठिन दौर में भी मीडिया का एक वर्ग अपनी पूरी ताकत के साथ यह बताने की कोशिश कर रहा है कि इस वायरस के संक्रमण के लिए तब्लीग़ी जमात पूरी तरह जिम्मेदार है।

इस वर्ग ने मुसलमानों को आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी नागरिकों के रूप में प्रस्तुत किया है। इसके बाद देश भर में मुसलमानों पर हमले और उनसे भेदभाव किए जाने की ख़बरें सामने आई हैं।

काटजू ने कुछ घटनाओं को लेकर विशेष उदाहरण दिये हैं। पहला उदाहरण काटजू ने तब्लीग़ी जमात के प्रमुख मौलाना साद का दिया। उन्होंने लिखा कि कई मीडिया चैनलों ने तब्लीग़ी जमात के प्रमुख मौलाना साद को एक शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 304 (ग़ैर इरादतन हत्या) के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई है और उनके घर पर छापा भी मारा गया है।

सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के एक वर्ग ने उनपर जानबूझकर भारत में कोरोनोवायरस फैलाने का आरोप लगाया है। जो पूरी तरह झूठ और गलत है। निजामुद्दीन के मरकज़ में कई दशकों से मुसलमान इकट्ठा होते रहे हैं ये कोई पहली बार नहीं है।

मरकज़ में कई लोग मलेशिया, इंडोनेशिया, किर्गिस्तान आदि से आए थे और यह संभव है कि कुछ लोग कोरोना से संक्रमित रहे हों जिन्होंने अनजाने में जमात के दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर दिया।

लेकिन यह कहना कि ऐसा जानबूझकर किया गया, यह बिल्कुल बेतुका है। इसलिए मौलाना के ख़िलाफ़ यह एफ़आईआर पूरी तरह से अनुचित और आधारहीन है।

काटजू ने अपने लेख में लिखा कि, कुछ लोग पूछते हैं कि मौलाना साद पुलिस के सामने सरेंडर क्यों नहीं करते? कोई भी इसके सही कारण का अनुमान नहीं लगा सकता है लेकिन यह बहुत संभव है कि वह डर गए हैं कि ऐसा करने पर पुलिस उन पर थर्ड डिग्री का उपयोग करेगी।

इसके बाद काटजू ने राजस्थान का एक उदाहरण और दिया। लिखा कि, भरतपुर के एक सरकारी अस्पताल में एक गर्भवती महिला को भर्ती करने से मना कर दिया गया क्योंकि वह मुसलिम थी। भर्ती न किए जाने से उसके बच्चे की मौत हो गई। लेकिन इस घटना की आधिकारिक जांच में इस तथ्य को दर्ज किया गया कि डॉक्टर को संदेह था कि वह तब्लीगी जमात से थे।

इसके अलावा तब्लीगी जमात को लेकर मीडिया में फैलाये गए झूठ से पंजाब के मुसलमानों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वहां के मुस्लिम गुर्जरों को दूध बेचने में मुश्किल हो रही है। वहीं कर्नाटक में साम्प्रदायिकता मुसलमानों के सामाजिक बहिष्कार पर जोर दे रही है।

उन्होंने ने लिखा कि, मुख्यधारा के मीडिया ने कहा है कि तब्लीग़ी जमात के सदस्य ‘सुपर स्प्रेडर’ हैं और कुछ लोगों ने मांग की कि उन्हें गोली मार दी जानी चाहिए। उन पर डॉक्टर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर थूकने, अस्पताल के वार्डों में शौच करने, नर्सों के साथ दुर्व्यवहार करने, मूत्र की बोतलें फेंकने, चिकन बिरयानी की मांग करने आदि का आरोप लगाया गया।

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