प्रतीकात्मक तस्वीर

14 दिन से चैन से सो नहीं पा रहे इस गांव के लोग, गांव छोड़ना शुरू, रात में लाइटे बंद करवा रही सेना

भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुए तनाव में उत्तरी कश्मीर के उरी कस्बे के गांव बालाकोट के स्थानीय लोग सहमे हुए है। बतादे की ये जगह पहाड़ियों पर तैनात पाकिस्तानी सेना चौकियों की रेंज में आती है। गांव के लोग यहाँ तय नहीं कर पा रहे की गांव से पलायन करे की अभी आधिकारिक घोषणा का इंतेज़ार करे।

गांव बालाकोट के स्थानीय निवासी तथा पूर्व सैनिक फारूख अहमद ने कहा की, “हम आश्वस्त नहीं हैं कि क्या करें। हम जंग के बीच फंस गए हैं। फारूख अहमद ने आगे कहा, ‘अगर हम अपने घर छोड़ देंगे तो हमें नहीं पता कि कहां जाना है। अगर हम गांव छोड़ते हैं तो हमारे घरों की देखभाल कौन करेगा?”

लाइन आफ कंट्रोल (LOC) से सटे गांवों में यह सवाल सभी के दिमाग में तब से यह सवाल घर करने लगा है। जब गांव के लोगो की नींद गोलाबारी की आवाज से खुली। जम्मू क्षेत्र में कुछ ही घंटे बाद भारत-पाक के बीच लड़ाकू विमानों से लड़ाई हुई।

बता दें कि मंगलवार को भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में जैश के आतंकी ट्रेनिंग कैंप को तबाह कर दिया था। जिसके बाद बालाकोट खबरों में आ गया। लेकिन कुछ ही देर में यह साफ़ हो गया की भारतीय वायुसेना ने जिस बालाकोट में हमला किया है वो पाक के काफी अंदर खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में आता है। कश्मीर के बालाकोट के निवासी शबीर अहमद (31) ने बताया की, “पुलवामा हमले के बाद से हम सो नहीं पाए हैं क्योंकि हर कोई डरा हुआ है कि कुछ भी हो सकता है। हम सबसे पहले निशाना बनते हैं और आगे भी रहेंगे जब भी सीमा पर गोलीबारी होती है।”

जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार, भारत और पाकिस्तान में जारी तनाव के बीच लाइन आफ कंट्रोल (LOC) से सटे सिलिकोट के निवासीयो ने बुधवार सुबह से गांव छोड़ना शुरू कर दिया। इस गांव में केवल 20 परिवार ही रहा करते है। गांव के एक नागरिक ने बताया की उसने अपने परिवार को उरी में रिश्तेदार के यहां भेज दिया। बालकोट के एक अन्य नागरिक ने दावा करते हुए कहा, स्थानीय आर्मी कैंप से उसे दोपहर में फ़ोन आया। जिसमे रात को लाइटें बंद करने का निर्देश दिया गया।

उस नागरिक ने आगे कहा, “हालांकि यहां सभी को यही लगता है कि रात के समय लाइट जलाए रखने का मतलब यह है कि हम निशाना नहीं बनेंगे। हम अपनी जान खतरे में नहीं डालना चाहते।” गांव के निवासियों का कहना है की इन गांवों में किसी में भी बंकर नहीं बनाये गए है।

वही गांव वालो कहा दावा है की साल 2005 में भूकंप आने की वजह से बंकर गिर गया था। तब से सरकार ने दोबारा बंकर नहीं बनवाया। बालाकोट की रहने वाली मीरा बेगम (70) ने बताया की, “मेरे बेटों ने सेना में सेवा दी है। क्या हम इस देश के हिस्सा नहीं हैं। सरकार को हमारे बारे में फ़िक्र क्यों नहीं है? ऊपरवाला भी हमारी नहीं सुन रहा और न ही हमारी सरकार। हमें क्या करना चाहिए।” वही सब डिविजनल मजिस्ट्रेट रियाज मलिक ने जानकारी देते हुए कहा की उरी में एक इमर्जेंसी कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। सभी तैयारियां पूरी की गई है। अगर उरी में सीजफायर उल्लंघन किया जाता है तो जानमाल का कोई नुकसान नहीं होगा।

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