वर्तमान राजनीतिक संघर्ष और मिल्ली तंजीमों का रोल’

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आज देश में जिस प्रकार से मिल्ली तंजीमों पर सवाल उठने लगे हैं वो चिंताजनक है। मिल्ली तंजीमों के लिए भी ये आत्ममंथन का समय है और समाज और देश के लिए हानिकारक भी। मिल्ली तंजीमों ने भी अपना रोल इस सामज के लिए अदा किया है। लेकिन कारण हैं कि आज उनपर प्रश्न उठने लगे हैं? आखिर क्या कारण है कि जिन तंजीमों के पीछे भारतीय मुसलमान बिना कोई प्रश्न किये उनके पीछे खड़ा हो जाता था आज उनके बार बार आवाज़ देने पर भी जनता सुप्तावस्था में पड़ी रहती है? इसको जानने और समझने के लिए बदलते भारतीय राजनीति को समझना भी बहुत आवश्यक है। जिस प्रकार स्वतंत्रता के बाद से राजनीति और राजनीतिक पार्टियों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा बनाये रखने के जनमुद्दों से हटकर जनता के भावनाओं पर पर अपनी राजनीति को केंद्रित किया उसकी चपेट में हर समाज के अंदर काम करनेवाली संगठनों को भी इसने अपने चपेट में लिया।

मिल्ली तंजीमें भी इसकी चपेट से निकल नही सकीं। इन तंजीमों के शीर्ष पर बैठे लोगों के निजी स्वार्थ को पूरा करते हुए इनके साथ समझौते होते रहे। जनभावनाओं को उभारा गया और बार बार उसके साथ खिलवाड़ हुआ। चाहे अलीगढ़ मुस्लिम विध्विद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे का मामला उठा हो, चाहे बाबरी मस्जिद, चाहे शाह बानो केस या चाहे ट्रिपल तलाक़ का मामला हर बार मिल्ली तंजीमों ने इसमें बड़ा खेल खेला। मुद्दों को दरकिनार करते हुए जनता की भावनाओं के खेल में उलझाया गया और फिर जमकर इसकी कहीं न कहीं सौदेबाज़ी हुई। मुसलमान हर बार ठगा गया और अब उसके प्रतिरोध देखने को मिल रहे हैं। एक बड़े धड़े का इन तंजीमों के ऊपर से विश्वास उठ सा गया। जिसने मुसलमानो को तथाकथित राजनीतिक पार्टियों का बंधुआ मजदूर से बना दिया। आज स्थिति यह है कि मुसलमान अपने अस्तित्व बचाने के लिए भयभीत और शंकित है।

राजनीतिक पार्टियों और मिल्ली तंजीमों की इस गठजोड़ ने सत्ता को एक धुरी प्रदान की। जिन तंजीमों की आत्मा सेक्युलिज़्म और लोकतंत्र की बुनियाद पर थी उनके अंदर स्वयं लोकतंत्र और सत्ता नही बचा। जो जहां बैठा था वो वहां का मठाधीश बन बैठा। वो सत्ता के नज़दीक बने रहने में अधिक सहज महसूस करने लगा जिसके कारण उनके अंदर मूल समस्याओं से लड़ने की, संघर्ष करने की क्षमता जाती रही। सेक्युलरिज़्म बचाने वालों के अंदर जब सेक्युलिज़्म खुद ही नही रह, लोकतंत्र बचाने वालों की आस्था जब लोकतंत्र में ही नही रही तो वो लोकतंत्र और सेक्युलरिज़्म बचाने की परवाह क्या करते, संघर्ष क्या करते? जिन तंजीमों ने सत्ता का सुख भोगा सत्ता बदलते वो फिर उसी विचारधारा के साथ रहकर संघर्ष करने की जगह उन्होंने पुराने साथियों के ऊपर दोष मढ़ना शुरू किया। इस दोषारोपण में उन सारी सेक्युलर पार्टियों के ऊपर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया और आज जो ये मुस्लिम युवा पीढ़ी की ज़ुबान से निकलता है कि सेक्युलरिज़्म बचाने का ठेका क्या सिर्फ मुसलमानो ने ले रखा है ये उसी का प्रतिफल है। ऐसा नही की तथाकथित सेक्युलर पार्टियां अपने दोष से, अपनी उन काली करतूतों से बरी हो जाते जो उन्होंने ने न सिर्फ मुसलमानो के साथ किया बल्कि दलितों और पिछड़ों के साथ भी किया। यही नही ये पक्षपात सवर्णों के साथ भी उतना ही हुआ जितना दूसरे वर्ग और समुदायों के साथ हुआ। सवाल ये है कि राजनीतिक पार्टियों और इन तंजीमों के अंदरूनी गठजोड़ में नुकसान किसका हो रहा है? लोकतंत्र का, सेक्युलरिज़्म का या आने वाले समय में संविधान का! जो लोग ये कहते हैं कि सेक्युलरिज़्म बचाने का ठेका क्या मुसलमानो ने लिया है तो वो विश्लेषण करें कि लोकतंत्र और सेक्युलरिज़्म बचाने में उनकी हिस्सेदारी क्या है? देश भर में क्या सेक्युलरिज़्म बचाने की लड़ाई मुसलमान लड़ रहा है? और अगर सेक्युलरिज़्म नही तोआपके पास उसका विकल्प क्या है? कम्युनलिज़्म! तो उसका बड़ा लाभ किसको मिलने जा रहा है?

मैं मुस्लिम युवाओं से एक विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि आप देश में हो रही घटनाओं और राजनीतिक सरगर्मियों को बारीकी से समझने का प्रयास कीजिये। और इसको ठीक से समझने के लिए आप सिर्फ चुनावों पर अपनी नज़र रखते हैं तो न आपको लोकतंत्र समझ आएगा न सेक्युलरिज़्म न आप लड़ाई को समझ पाएंगे। आप ट्रैप हो चुके हैं, वही कह रहे हैं जो आपसे कोई दूसरा कहवाना चाहता है।

तनवीर आलम

अध्यक्ष,

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र, मुम्बई

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