सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बाबरी मस्जिद मामले पर नहीं पड़ेगा कोई फर्क- खालिद रशीद महली

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दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के आये फैसले “मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं” पर ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने 27 सितम्बर को कहा की, इस फैसले से यह साफ़ हो गया है की अयोध्या मामले की सुनवाई मजहब की बुनियाद पर बिल्कुल भी नहीं होगी। उन्होने आगे कहा की हम सब कोर्ट के इस फैसले की इज़्ज़त करते है। लेकिन हम चाहते थे कि इस्माइल फारूकी वाले मामले को संवैधानिक पीठ के समक्ष रखा जाए, ताकि मामला हमेशा के लिए हल हो सके।

हिंदी सिआसत के अनुसार, 27 सितम्बर को ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा की, सुप्रीम कोर्ट के ‘मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं’ वाले फैसले से दो महत्वपूर्ण बाते निकलकर सामने आयी है। पहले ये की अयोध्या मामले की सुनवाई हरगिज मजहब के बुनियाद पर नहीं होगी।

मौलाना ने कहा की सुप्रीम कोर्ट अब 29 अक्तूबर से अयोध्या मामले की सुनवाई करने के लिए कहा है। इससे उम्मीद है की मामले की आखिरी सुनवाई जल्द से जल्द होगी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले “मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं” पर कहा मस्जिद का बुनियादी मकसद ही नमाज अदा करने का होता है। इसलिए मस्जिद का होना बेहत जरूरी है। यह बात कुरान, हदीस और इस्लामी कानून से पूरी तरह साबित है। इसको लेकर जितने भी सबूत और जिरह-बहस हुयी है कोर्ट के सामने रखे जाए। उन्होंने आगे कहा की, चूँकि सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च अदालत है और अयोध्या मामले की सुनवाई के मामले में उसे आने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।

ज्ञात हो की सुप्रीम कोर्ट ने ‘मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं’ के बारे में उच्चतम अदालत के 1994 के फैसले को फिर से देखने के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 2-1 के मेजोरिटी के फैसले में कहा कि दीवानी सिद्धांत का फैसला सबूतों के बुनियाद पर होना चाहिए और पहले आये फैसले की यहाँ कोई योग्यता नहीं है।

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